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शनिवार, 18 अगस्त 2007

खैरलांजी दलित हत्याकांड से उपजे सवाल

इन साठ वर्षों में देश में ढेरों दलित हत्याकांड हुए, लेकिन हत्यारों और हमलावरों को सजा नहीं मिली। लोकतंत्र के न्यायालय यह तक मानने को तैयार नहीं होते हैं कि सवर्णों का गिरोह हमला करने के लिए दलित बस्ती तक पैदल गया होगा। आखिर सीबीआई भी किसी दलित हत्याकांड में क्या जांच करेगी? ऐसे हत्याकांड़ों के कारण साफ दिखते आ रहे हैं। दलितों को बंदूक और रायफल के लाइसेंस देने की बात भी नई नहीं है। बिहार में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने दलितों को न केवल हथियारों के लाइसेंस देने की घोषणा की थी, बल्कि सरकारी खर्चे पर हथियार देने और उसे चलाने का प्रशिक्षण देने की भी अपनी योजना बताई थी। लेकिन वह कभी लागू नहीं हो सकी। जबकि भूपति और सवर्णों को दलितों और नक्सलवादियों से निपटने के लिए मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दूबे ने हथियार प्रशिक्षण कैंप भी लगवाए और मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र ने ऑल इंडिया रेडियो से आदेश देकर सवर्णों के दरवाजे तक अधिकारियों को हथियारों के लाइसेंस देने के लिए दौड़ाया। इसी परिप्रेक्ष्य में खैरलांजी हत्याकांड के दो महीने के बाद महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर. आर. पाटिल द्वारा सीबीआई जांच और दलितों को सुरक्षा के लिए बंदूक-रायफल के लाइसेंस देने की घोषणा का कोई अर्थ नहीं है। ये महज खैरलांजी हत्याकांड के खिलाफ आंदोलनकारियों के गृहमंत्री के दफ्तर में घुसने और नागपुर, अमरावती एवं शोलापुर समेत सूबे में दलितों के जुझारू आंदोलन के दबाव से निकलने के बहाने हैं। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पाटिल के बयान को गौर से देखें तो केवल वे यह सूचना भर दे रहे हैं कि दलित भी देश के नागरिक होने के नाते अपने जान माल की सुरक्षा के लिए हथियारों के लाइसेंस ले सकते हैं। वे कोई नई नीति की घोषणा नहीं कर रहे हैं। दरअसल सरकार की घोषणा को मीडिया मसाले लगाकर बेचता है। महाराष्ट्र के खैरलांजी के हत्याकांड में हिन्दी मीडिया को कोई रोमांच नहीं दिखा। लेकिन दलितों को हथियार देने की घोषणा से उसके पूर्वाग्रह जागृत हो जाते हैं।
दलित हत्याकांड़ों पर सरकार और राजनीतिक पार्टियों की प्रतिक्रिया समय के मुताबिक होती है। शिव सेना और भाजपा ने इस हत्याकांड पर प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। मौजूदा राजनीति में फिलहाल महाराष्ट्र में यह संभव नहीं दिखता है कि वहां की सरकार दलितों की सुरक्षा के संदर्भ में कोई कड़ा फैसला लेने का साहस दिखा सगी खैरलांजी हत्याकांड के बाद दो महीने तक सरकार सक्रिय नहीं दिखी। यह तो पहली बात है। अब वह सक्रिय दिख रही है तो उसकी वजह दलितों का बढ़ता आंदोलन है और सरकारी तंत्र अपनी घोषणाओं से उस पर पानी डालने की कोशिश में लगा रहा। पहले आंदोलन को दबाने की भी हर संभव कोशिश की गई है। विरोधा को कानून एवं व्यवस्था की दृष्टि से खतरनाक बताने के इरादे से गृहमंत्री ने उसे नक्सलवाद से प्रभावित तक बताया था। दलित नेताओं की राजनीति और दलितों की सुरक्षा के मसले के बीच कोई रिश्ता नहीं रह गया है। दलित नेता कुछ घिसी पिटी मांगें कर देते हैं और कटघरे में खड़ी सरकार उन्हें तरजीह देकर आंदोलन को बिखराने की कोशिश में लग जाती है। दलित राजनीति यहां आकर जकड़ गई है।
राजनीति में इन दिनों किस तरह का दबाव है उसके एक पहलू को महाराष्ट्र से समझने की कोशिश की जा सकती है। महाराष्ट्र में पिछले विधानसभा चुनाव से पहले दलित परिवार के सुशील कुमार शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया था। वहां दलित समर्थक पार्टियां सक्रिय हो रहीं थी और उनका चुनाव पर प्रभाव की स्थिति स्पष्ट हो रही थी। लेकिन चुनाव परिणाम के आने के बाद जब राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस सत्ताा में आईं तो कांग्रेस ने सुशील कुमार शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने से इंकार कर दिया, जबकि दिल्ली और दूसरे राज्यों में कांग्रेस के दोबारा विधानसभा के चुनावों में जीत हासिल होने पर पुराने मुख्यमंत्रियों को ही सत्ता सौंपी गई। दरअसल हिन्दुत्व और नई आर्थिक नीति के चरम अवस्था ने एक उलट स्थिति यह पैदा कर दी है कि दो साझा पार्टियां खुद को ताकतवरों की पक्षधार दिखने की होड़ करें। महाराष्ट्र में जब राष्ट्रीय कांग्रेस दल ने पाटिल को अपना नेता बनाने का फैसला किया तो कांग्रेस की तरफ से विलासराव देखमुख फिर से मैदान में सबसे ज्यादा ताकतवर हो गए। राजनीति का यही पहलू खतरनाक रूप में सामने आ रहा है। इसने किसी भी स्तर पर अपेक्षाकृत कमजोर माने जाने वाले समाज के हिस्से की सुरक्षा और विकास की जिम्मेदारी से तंत्र को पूरी तरह से मुक्त कर दिया है। पहले भी वह मुक्त रहता था, लेकिन एक फिंजां में एक दबाव होता था। लेकिन अब तो उसका मुक्त होना इस रूप में विस्तारित हुआ है कि तंत्र हमले में ही शामिल हो जाता है। महाराष्ट्र की ही तरह हरियाणा में भी इसे देखा जा सकता है। वहां ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी को हराने के बाद कांग्रेस जब सत्ताा में आई तो वह देश के कम से कम एक राज्य में दलित मुख्यमंत्री बना सकती थी। वहां की दलित आबादी भी तमिलनाडु के बराबर है। लेकिन उसने समाज के दबंग माने जाने वाली जाति जाट के बीच से ही मुख्यमंत्री का चुनाव किया। ओम प्रकाश चौटाला के हराए जाने के बाद भी कांग्रेस को यह डर सताता रहा कि कहीं जाट वोट उससे नाराज न हो जाए। हरियाणा में दलितों के खिलाफ झज्जर से लेकर गोहाना तक ढेर सारी घटनाएं बिखरी पड़ी हैं। इसमें जाति से जाट और विचार से हिन्दुत्ववादी दोनों थे। ओम प्रकाश चौटाला के कार्यकाल में झज्जर में हमलावर दलितों को दुलिना पुलिस चौकी में घंटों तक मारते रहे और गोहाना में मुख्यमंत्री हुड्डा के नेतृत्व वाले पुलिस तंत्र ने घंटों खड़े रहकर बाल्मीकि मुहल्ले को गैस सिलेंडर से उड़ाते ओर जलाते देखा। खैरलांजी पिछड़ी जाति बाहुल्य गांव है और हमलावर जाति को मराठा राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां कतई यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि किसी दलित के मुख्यमंत्री होने भर से दलित हत्याकांड़ों में कमी हो सकती है। यह किसी भी जाति-समाज और विचार के दबाव की स्थिति को मापने भर के लिए उदाहरण के रूप में पेश किया जा रहा है। आखिर कांग्रेस को महाराष्ट्र और हरियाणा में ताकतवर समझे जाने वाली जाति सत्ताा के सारथी के लिए जरूरी क्यों लगती है? ताकतवर समाज की तरफ मुखातिब होने का अर्थ दबंगई के विचारों को हर स्तर पर बढ़ावा देने की नीति को स्वीकार करना होता है। 1990 के बाद सभी संसदीय पार्टियों ने दबंगों के साथ रहना अपनी अनिवार्य नीति के रूप में मान लिया है। सत्ता तंत्र का चरित्र साफ है। सवाल दलित राजनीति की तरफ भी है। महाराष्ट्र में राजनैतिक स्तर पर दलित उभार रहा है। उससे संसदीय राजनीति प्रभावित होती रही है। लेकिन इस नये दौर में वह स्थिति क्यों नहीं रही। क्या यह दलित राजनीति के विकास में कोई गंभीर चूक का संदेश है? या फिर दलित राजनीति को मुकम्मल मान लेने का दंभ है? दलित राजनीति संघर्ष के निरंतर प्रवाह से ही विकसित हो सकती है। संघर्ष सुरक्षा की व्यवस्था तभी कर सकता है, जब केवल संसदीय सत्ता पाने या पुराने ढांचे की सामाजिक सत्ता में छोटी-मोटी जगह हासिल करने की महत्वाकांक्षा का शिकार नहीं हो।